शुक्रबार, चैत्र २०, २०८२
Friday, April 3, 2026

थारू भाषाको कविता “गोरहा”

  • 178
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    178
    Shares

मुना चौधरी

आइतबार १७ चैत २०८१

यी चियै गोरहा
गोरहैनी
चिपरी
यी सैब गोबरसे बनल छै ।
जार मैहना गोरहा बनाइछै
गुमार मैहना गोरहैनी बनाइछै
बारहो मास चिपरी बनाइछै ।

गोरहा घर पछारी के बारीमे
या आइरमे बनाइछै
गोरहाके छोहा कहै छै
गोरहा बन्याके छोहामे सुखैले दैछै
गोरहैनी गाहली या दरबजामे बनाइछै
गोरहैनी पाइनझाइर मैहना बनाइछै
पाइनझाइरसे नै भिजे कैहके
घरके भित्ता ने त चनमारमे सुखाइछै ।

बिचमे सन्ठि राइखके
गोरहा, गोरहैनी बनाइछै
गोरहाके दुनु दिसरा मुर रहैछै
गोरहैनीके मुर नै रहैछै
चिपरी थोपल थापल रहै छै
चिपरी हाथमे थोइपके
भित्तामे साइटके सुखैले दैछै ।

गोरहा गोरहैनी या चिपरी
तिनोके बनावट फरक हैछै लेकिन
तिनो आइग बारैले
आइग तापैले या
खाना बनाइले
प्रयोग करैछै ।

गोरहाके आइग
बेसी सयमतक टिकैछै
गोरहैनी या चिपरीके आइग
कम समयतक टिकैछै
हँ यी चियै गोइठा, गोरहा,
गोरहैनी या चिपरी ।

WRITE COMMENTS FOR THIS ARTICLE

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

RELATED NEWS ARTICLES

YOU MAY ALSO LIKE

Jayjanatatv

Jayjanatatv

0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x